बादरु गरजइ बिजुरी चमकइ
बैरिनि ब्यारि चलै पुरबइया
काहू सौतिनि ने भरमाये
ननदी फेरि तुम्हारे भइया।
दादुर मोर पपीहा बोलैं
भेदु हमारे हिय को खोलैं
बरसा नाहिं, हमारे आँसुन-
सै उफनानी ताल-तलैया।
काहू .....................।।
सबके छानी छप्पर द्वारे
छाय रहे उनके घर वारे
बिन साजन को छाजन छाबै
कौन हमारी धरै मड़ैया।
काहू .....................।।
सावन सूखि गई सब काया
देखु ‘भक्त’ कलियुग की माया
घर की खीर खुरखुरी लागै
बाहर की भावै गुड़-लइया।
काहू .....................।।
देखि देखि के नैन हमारे
भँवरा आवैं साँझ-सकारे
लछिमन रेखा खिंची अवधि की
भागि जायँ सब छुइ छुइ ढइया।
काहू .....................।।
माना तुम नर हो हम नारी
बजै न एक हाथ से तारी
चारि दिना के बाद यहाँ से
उड़ि जायेगी सोन चिरैया।
काहू .....................।।
-ठा० गंगाभक्त सिंह ‘भक्त’
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