Wednesday, December 02, 2020

झुकी-झुकी पलकों पर

झुकी-झुकी पलकों पे रीत रही रात
अनबोले बोलों में बीत रही रात।

अंतस की आग आज अधरों पे आ बैठी
है महकी-महकी, हर जलती सांस रे
महुआ की गंध भरे और मान मत साधो
सकुचो मत प्राण! तनिक आओ तो पास रे
बांधों मत अलकों को कंधों पर छितरा दो
सिहर-सिहर खिल जाए सकुचाया गात रे
झुकी-झुकी पलकों पे रीत रही रात
अनबोले बोलों में बीत रही रात।

हाथों से मत ढाँपों रतनारी आंखों को
चांदनियाँ तले सभी सपने बहकने दो
ललसाए अधरों पर मौन ही जमा न रहे
प्यासे अरमानों को आँच में दहकने दो
चुगली खाता दीपक, खुद ही बुझ जाएगा
लाल-गुलाबी होगा सिंदूरी प्रभात
झुकी हुई पलकों पे रीत रही रात
अनबोले बोलों में बीत रही बात।।

-शंकर सक्सेना

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