फिर कुहुक
बनकर समाई
याद मधुबन की।
रोम में
जगने लगी है
गंध चन्दन की।
फिर कुहुक...
थामकर
बैठे रहे
अरुणाभ किरणों की हथेली
लाज से
सकुचा गई-
थी, भोर की दुल्हन नवेली
तीर पर
उतरी नहाने
रूपसी मन की
फिर कुहुक...
डबडबाती
आँख-सी है
रूप की यह
झील निर्मल
पास में
सुधियाँ तुम्हारी
हो कि कोई लहर चंचल
ढूँढ़ता हूँ
हर लहर में
छाप जीवन की
फिर कुहुक
बनकर समाई
याद मधुबन की।
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
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