Tuesday, September 19, 2023

वे वासंती गीत तुम्हारे

जाने कैसे भूल गये तुम 
वे सारे अनुबंध हमारे 
मुझको अब तक याद आते हैं
वे बासंती गीत तुम्हारे 

अलकों को मावस कहते थे 
आनन को तुम शशि का दर्पण
लहरों-सी थी तन की भाषा 
वेद-ऋचाओं जैसा था मन 
साँसें महकें जूही चम्पा 
चन्दन-वन त्यौहार हमारे 
पर अब थके हुए से लम्हे
अपनी-अपनी नियति से हारे
मुझको अब तक... 

संध्या छेड़े राग-रागिनी
मध्यम सुर में कोयल बानी
अब भी ठहरा समय वहीं पर 
मछली से नयनों में पानी 
करवट लेती रात अभी पर
सुबह से रूठे हैं उजियारे 
दिन जोगी मन सूना-सूना
कौन किसी की राह निहारे 
मुझको अब तक... 

मरुथल बसा हुआ है भीतर 
बाहर वर्षा जल है भारी 
खण्डित प्रणय टीसता ऐसे 
हरे पेड़ पर जैसे आरी 
विष पीकर भी रही बावरी 
मीरा पल-पल श्याम पुकारे 
वही बाँसुरी, वही कन्हैया 
वो यमुना तट वही किनारे 
मुझको अब तक ... 

-रंजना गुप्ता

11 comments:

Pragati said...

विरह की बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।

डॉ विनीता कृष्णा said...

हृदयस्पर्शी कोमल संवेदनाओ की अभिव्यक्ति।

Anonymous said...

भाव और प्रवाह से भरा विरह गीत।

Anonymous said...

बहुत सुंदर विरही प्रेम गीत के लिए रंजना जी आपको बधाई । रेणु चन्द्रा

Anonymous said...

“गुनगुना लो प्यार से/ यह गीत मेरा है तुम्हारा”- वाह! इस सुंदर गीत के लिए बधाई ।
डॉ॰ सुनीता यादव

Sonam yadav said...

सरस और कोमल भावनाओं से ओत-प्रोत प्रेम गीत
खूब खूब शुभकामनाएं आपको

Sonam yadav said...

सरस और कोमल भावनाओं से ओत-प्रोत प्रेम गीत
खूब खूब शुभकामनाएं आपको

शर्मिला said...

सुंदर,मुलायम भाव लिए एक प्यारा गीत। हार्दिक बधाई

शर्मिला चौहान

Anonymous said...

बहुत सुंदर भाव लिए, मुलायम सा गीत। हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ।
शर्मिला चौहान

किरन सिंह said...

जाने कैसे भूल गए तुम वे सारे अनुबंध हमारे बहुत ही सुंदर गीत

Poonam Mishra said...

भावों से भरा गीत ।

पूनम मिश्रा'पूर्णिमा'