पा पत्र प्रेम का यह पहला
मैं पागल-पागल फिरती हूँ
छूता है मन नीलाभ गगन
फिर बादल-बादल फिरती हूँ
अतुलित निधि उर संचित कर,
मैं नर्तन-नर्तन करती हूँ,
स्वप्निल कोमल स्पर्श तेरा,
पा आँचल-आँचल छिपती हूँ।
जब प्रेम-स्रोत फूटा मन में,
आशा का उपवन बढ़ा-पला,
उल्लास हिंडोले चढ़ झूला,
मल्हार गीत स्वर बह निकला
शृंगार आभूषण सब तज कर,
धानी चुनर यह ओढ़ चला,
हैं इंद्रधनुष के रंग भले
तन प्रीत की रीत के रंग घुला।
भावों के कोमल पंख लगा,
अवनि की सघन हरियाली में,
सहेज पिटारी प्रेम अक्षर की,
हिय बटोर भोर की लाली में
अल्हड़ उपालंभ शब्द भर,
कर उँडेल कलम मतवाली में
आँसू स्याही से लिखी विरह
पाती नव छंद सयाली में।
-डा. आरती लोकेश
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