बुद्धिनाथ मिश्र लोकप्रिय गीतकार हैं, उनके गीतों में एक विशेष तरह का सम्मोहन रहता है... आज उनके इस नवगीत को पढ़ें और समझें कि बिम्ब प्रतीकों में कैसे कुछ गहरी बात कही जा सकती है... प्रतिक्रिया भी लिखें...
...
एक बार और जाल
फेंक रे मछेरे !
जाने किस मछली में
बन्धन की चाह हो !
सपनों की ओस
गूँथती कुश की नोंक है
हर दर्पण में उभरा
एक दिवालोक है
रेत के घरौंदों में
सीप के बसेरे
इस अँधेर में कैसे
नेह का निबाह हो !
जाने किस मछली में...
उनका मन आज
हो गया पुरइन पात है
भिगो नहीं पाती
यह पूरी बरसात है
चन्दा के इर्द-गिर्द
मेघों के घेरे
ऐसे में क्यों न कोई
मौसमी गुनाह हो !
जाने किस मछली में...
गूँजती गुफ़ाओं में
पिछली सौगन्ध है
हर चारे में कोई
चुम्बकीय गन्ध है
कैसे दे हंस
झील के अनंत फेरे
पग-पग पर लहरें जब
बाँध रही छाँह हों !
जाने किस मछली में...
कुंकुम-सी निखरी कुछ
भोरहरी लाज है
बंसी की डोर बहुत
काँप रही आज है
यों ही ना तोड़ अभी
बीन रे सँपेरे
जाने किस नागिन में
प्रीत का उछाह हो !
जाने किस मछली में...
-बुद्धिनाथ मिश्र
2 comments:
“जाने किस मछली में बंधन की चाह हो”बहुत बहुत सुंदर रस शब्द पगा गीत है ।वाहहहह इन महान कवियों को नमन
प्रेम में भावतिरेक होता है, विरह की पीड़ा या समर्पण का भाव होता है, मुझे यह प्रेम गीत नहीं लगता।
Post a Comment